सेवक और सेवकाई

सेवक और सेवकाई

डॉ. शिबू थॉमस

एपिसोड 2 – कठिन समय में सेवक कैसे खड़ा रहे

प्रिय पास्टरों, प्रचारकों और परमेश्वर के सेवकों,

यदि आप कई वर्षों से सेवकाई में हैं, तो आप इस बात को अच्छी तरह समझते होंगे कि सेवकाई का मार्ग हमेशा आसान नहीं होता।

कभी ऐसे दिन आते हैं जब सेवकाई में आनंद होता है।

  • प्रार्थनाओं के उत्तर मिलते हैं।
  • लोग आत्मिक रूप से बढ़ते हैं।
  • कलीसिया में उत्साह दिखाई देता है।

लेकिन कुछ समय ऐसे भी आते हैं जब सेवक अंदर से टूटने लगता है।

  • कभी विरोध बढ़ जाता है।
  • कभी अपने ही लोग गलत समझते हैं।
  • कभी आर्थिक संघर्ष होता है।
  • कभी परिवार दबाव महसूस करता है।
  • कभी ऐसा लगता है कि हमारी मेहनत का कोई फल दिखाई नहीं दे रहा।

और सबसे कठिन समय वह होता है जब सेवक बाहर से मजबूत दिखाई देता है, लेकिन अंदर से थक चुका होता है।

आज मैं इसी विषय पर बात करना चाहता हूँ—

कठिन समय में परमेश्वर का सेवक कैसे खड़ा रहे?

मैं यह लेख केवल एक शिक्षक के रूप में नहीं लिख रहा हूँ। मैं यह बातें अपने जीवन के अनुभवों से लिख रहा हूँ।

सेवकाई के इन वर्षों में मैंने आशीष भी देखी है और संघर्ष भी देखे हैं।

ऐसे समय भी आए जब लोगों ने बहुत प्रेम किया।

और ऐसे समय भी आए जब बिना कारण आलोचना हुई, गलत समझा गया और दिल टूट गया।

लेकिन एक बात मैंने सीखी—

यदि बुलाहट परमेश्वर से है, तो वही सेवक को संभालता भी है।


सेवकाई में कठिन समय आना असामान्य नहीं है

कई युवा सेवक सोचते हैं कि यदि परमेश्वर ने बुलाया है, तो रास्ता आसान होगा।

लेकिन बाइबल हमें ऐसा नहीं सिखाती।

यीशु ने कभी यह नहीं कहा कि सेवकाई में संघर्ष नहीं होगा।

बल्कि यीशु ने स्पष्ट कहा:

यूहन्ना 16:33 “जगत में तुम्हें क्लेश होता है; परन्तु ढाढ़स बाँधो, मैं ने जगत को जीत लिया है।”

इस संसार में संघर्ष होंगे।

सेवकाई में भी संघर्ष होंगे।

प्रेरित पौलुस ने भी अपने जीवन में बहुत कठिनाइयाँ देखीं।

2 कुरिन्थियों 11:24-28 “मैं ने यहूदियों से पाँच बार उनतालीस-उनतालीस कोड़े खाए। तीन बार बेंतों से पीटा गया, एक बार पत्थरवाह किया गया… बार-बार यात्राओं में, नदियों के संकटों में, डाकुओं के संकटों में…”

फिर भी पौलुस रुका नहीं।

क्यों?

क्योंकि उसका भरोसा परिस्थितियों पर नहीं, बल्कि परमेश्वर की बुलाहट पर था।


कठिन समय सेवक को तोड़ने नहीं, बनाने आते हैं

हम अक्सर कठिन परिस्थितियों से बचना चाहते हैं।

लेकिन परमेश्वर कई बार उन्हीं परिस्थितियों का उपयोग सेवक को मजबूत बनाने के लिए करता है।

सोना आग में तपकर शुद्ध होता है।

उसी प्रकार सेवक भी संघर्षों के बीच परखा जाता है।

1 पतरस 1:6-7 “यदि अब तुम्हें थोड़े समय के लिये नाना प्रकार की परीक्षाओं के कारण दुःखी होना पड़े, तो यह अवश्य है। ताकि तुम्हारा परखा हुआ विश्वास… यीशु मसीह के प्रगट होने पर प्रशंसा और महिमा और आदर का कारण ठहरे।”

कठिन समय यह प्रकट करता है कि हमारा भरोसा वास्तव में कहाँ है।

जब सब कुछ अच्छा चलता है, तब विश्वास करना आसान होता है।

लेकिन जब विरोध आता है, तब वास्तविक विश्वास दिखाई देता है।


एलिय्याह भी टूट गया था

कई सेवक सोचते हैं कि यदि वे टूटते हैं या थकते हैं, तो शायद उनमें विश्वास की कमी है।

लेकिन बाइबल हमें दिखाती है कि परमेश्वर के महान सेवक भी कभी-कभी निराश हुए।

एलिय्याह ने कर्मेल पर्वत पर अद्भुत विजय देखी।

  • आग स्वर्ग से उतरी।
  • लोगों ने परमेश्वर की महानता देखी।

लेकिन उसी एलिय्याह ने थोड़े समय बाद जंगल में बैठकर कहा:

1 राजा 19:4 “हे यहोवा, बहुत हुआ; अब मेरा प्राण ले ले।”

यह एक टूटे हुए सेवक की आवाज़ थी।

लेकिन ध्यान दीजिए—

परमेश्वर ने एलिय्याह को त्यागा नहीं।

  • परमेश्वर ने उसे आराम दिया।
  • भोजन दिया।
  • और फिर धीरे से उससे बात की।

यहाँ एक बहुत बड़ी शिक्षा है—

कभी-कभी सेवक को केवल एक और उपदेश नहीं, बल्कि विश्राम, शांति और परमेश्वर की उपस्थिति की आवश्यकता होती है।


सेवक की सबसे बड़ी लड़ाई कई बार लोगों से नहीं, मन से होती है

बहुत बार सेवक बाहर की लड़ाई से अधिक अंदर की लड़ाई लड़ता है।

  • निराशा
  • अकेलापन
  • डर
  • असफलता का भाव
  • लोग क्या सोचेंगे यह चिंता

शैतान अक्सर सेवक के मन पर हमला करता है।

इसीलिए पौलुस लिखता है:

2 कुरिन्थियों 10:4-5 “हमारे युद्ध के हथियार शारीरिक नहीं, पर गढ़ों को ढाने के लिये परमेश्वर के द्वारा सामर्थी हैं… और हर एक भावना को कैद करके मसीह का आज्ञाकारी बना देते हैं।”

सेवक को अपने मन की रक्षा करनी सीखनी होगी।

  • हर आवाज़ परमेश्वर की आवाज़ नहीं होती।
  • हर आलोचना सत्य नहीं होती।
  • हर असफलता अंत नहीं होती।

कठिन समय में सेवक को क्या करना चाहिए?

1. परमेश्वर की उपस्थिति में लौटना

सबसे पहले सेवक को फिर से परमेश्वर की उपस्थिति में लौटना चाहिए।

सेवकाई करते-करते कई बार हम सेवा में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि परमेश्वर के साथ व्यक्तिगत समय कम हो जाता है।

लेकिन हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता मंच नहीं—

परमेश्वर की उपस्थिति है।

भजन संहिता 16:11 “तेरी उपस्थिति से आनन्द की परिपूर्णता होती है।“


2. अकेले मत लड़िए

कई सेवक अपनी सारी लड़ाइयाँ अकेले लड़ने की कोशिश करते हैं।

लेकिन परमेश्वर ने हमें संगति दी है।

एक सच्चा मित्र, एक वरिष्ठ सेवक, या एक प्रार्थना करने वाला भाई कई बार कठिन समय में बहुत बड़ी सहायता बन सकता है।

सभोपदेशक 4:9-10 “दो एक से अच्छे हैं… क्योंकि यदि उन में से एक गिरे, तो दूसरा अपने साथी को उठाएगा।“


3. बुलाहट को याद कीजिए

जब कठिन समय आता है, तब शैतान सबसे पहले हमारी बुलाहट पर हमला करता है।

वह कहता है:

“क्या सच में परमेश्वर ने तुम्हें बुलाया है?”

ऐसे समय में हमें फिर से उस बुलाहट को याद करना चाहिए जो परमेश्वर ने हमारे जीवन में दी थी।

पौलुस ने कहा:

2 तीमुथियुस 1:12 “मैं जानता हूँ कि मैं ने किस पर विश्वास किया है।“


मेरी व्यक्तिगत सीख

मेरे जीवन में भी ऐसे समय आए जब मैं अंदर से बहुत थक गया था।

  • कई बार ऐसा लगा कि लोगों को समझाना कठिन है।
  • कई बार आलोचना हुई।
  • कई बार विश्वासघात जैसा अनुभव हुआ।

लेकिन हर कठिन समय में परमेश्वर ने मुझे एक बात सिखाई—

सेवकाई हमारी नहीं है। यह परमेश्वर की सेवकाई है।

यदि सेवक अपना ध्यान लोगों से हटाकर फिर से परमेश्वर पर लगाए, तो वह फिर से खड़ा हो सकता है।


निष्कर्ष

प्रिय सेवकों,

यदि आप आज किसी कठिन समय से गुजर रहे हैं,

तो हिम्मत मत हारिए।

परमेश्वर ने आपको नहीं छोड़ा है।

शायद अभी रास्ता स्पष्ट न दिखाई दे,

लेकिन परमेश्वर अभी भी आपके साथ चल रहा है।

यशायाह 41:10 “मत डर, क्योंकि मैं तेरे संग हूँ… मैं तुझे दृढ़ करूँगा और तेरी सहायता करूँगा।”

आप अकेले नहीं हैं।

परमेश्वर अभी भी अपने सेवकों को संभाल रहा है।

दृढ़ रहिए। विश्वास बनाए रखिए। और चलते रहिए।

परमेश्वर आपको आशीष दे।